March 10, 2026

नमामि गंगे के 800 करोड़ के कार्यों पर गंभीर सवाल, करोड़ों खर्च और गंगा में फिर भी गिर रही गंदगी

गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना पर उत्तराखंड में हुए कामकाज की भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने कई गंभीर खामियों को उजागर किया है। वर्ष 2018-19 से 2022-23 की अवधि पर किए गए इस परफॉर्मेंस

 

ऑडिट में पाया गया कि योजना के तहत बनाए गए कई सीवेज ट्रीटमेंट (STP) या तो बेकार पड़े हैं, कई जगह चरों से सीवर कनेक्शन ही नहीं हैं, कई प्लोट क्षमता से अधिक सीवेज ले रहे हैं और कई स्थानों पर उपचारित किए बिना ही गंदा पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है।

 

रिपोर्ट को 10 मार्च 2026 को राज्य विधानसभा में पेश किया गया। इसमें योजना की योजना निर्माण, ढाचा निर्माण, परियोजना क्रियान्वयन, फंड प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था की गहन समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य सरकार में गंगा किनारे बसे शहरों में सीवेज द्वायें पर अपने संसाधनों से कोई खर्च नहीं किया,

 

जबकि स्वच्छता राज्य की जिम्मेदारी है।

 

13 साल बाद भी नहीं बना गंगा बेसिन प्रबंधन प्लान रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण ने लक्ष्य रखा था कि 2020 तक गंगा में बिना उपचारित सहरी गंदा पानी और औद्योगिक अपविष्ट का प्रवाह पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 13 साल बाद

 

भी राज्य गंगा समिति ने स्टेट रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान तैयार ही नहीं किया। इतना ही नहीं, गंगा बेसिन के सात जिलों में भी जिला गंगा योजना तैयार नहीं की गई, जिनमें शामिल है उत्तरकाशी

 

टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार।

 

इस वजह से सीवरेज प्रबंधन बिखरे हुए तरीके से हुआ और 2020 का लक्ष्य हासिल किया जा सका। स्थानीय लोगों को योजना में शामिल ही नहीं किया गया। नमामि

 

नहीं गंगे योजना का एक प्रमुख उद्देश्य था कि स्थानीय समुदायों करें योजना निर्माण में शामिल किया जाए, ताकि टिकाऊ बुनियादी ढांचा विकसित हो सके।

 

ऑडिट में पाया गया कि राज्य गंगा समिति, स्टेट मिशन फॉर कलीन गंगा और क्रियान्वयन एजेंसियां इनमें से किसी ने भी स्थानीय लोगों को योजना प्रक्रिया में बामिल नहीं किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि कई जगह अनुपयोगी या गलत ढंग से बने सीवरेज द्वांचे सामने आए।

 

राज्य सरकार ने अपने पैसे में नहीं बनाया कोई STP

 

रिपोर्ट में एक गंभीर तथ्या यह भी सामने जाया कि गंगा किनारे बसे शहरों में सीवेज ढांचे पर राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से खर्च नहीं किया। किसी भी शहर में राज्य सरकार ने STP वा घरेलू सीवर कनेक्शन नहीं बनाए और जर्मनी की KfW बैंक से वित्तपोषित परियोजनाएं भी वेवार हरिद्वार और ऋषिकेश तक सीमित रहीं।

 

21 STP बने, लेकिन एक भी घर से नहीं जुड़ा सीवर रिपोर्ट के मुताबिक सात गंगा नगरों में बनाए गए 21 STP घरों से जुड़े ही नहीं। इनमें बामिल है

 

नंदप्रयाग-2

 

कर्णप्रयाग – 5 STP

 

STP

 

स्दप्रयाग – 6 STP

 

कीर्तिनगर-2 STP

 

दमौली-1 STP

 

श्रीनगर श्रीकोट-3 STP

 

जोशीमठ-2 STP

 

जोशीमठ में 2010 से 2017 के बीच 42.73 करोड़ रुपये खर्च कर STP बनाए गए, लेकिन किसी भी घर से सीवर कनेक्यान नहीं किया गया।

 

कई शहरों में बेहद कम घर STP से जुड़े ऑडिट में पाया गया कि कई शहरों में घरेलू सीवर कनेक्शन बेहद कम है। जिसके जांकड़े निम्न प्रकार से दिए गए हैं।

 

शहर-STP से जुड़े घर

 

हरिद्वार-69%

 

ऋषिकेश-29%

 

श्रीनगर-123

 

उत्तरकाशी-9%

 

चमोली -67%

 

इसका मुख्य कारण रहा पर्याप्त सीवर लाइन का न होना और STP की क्षमता कम

 

होना। साथ ही को-ट्रीटमेंट पनोट भी नहीं बन पाया। क्योंकि, उत्तराखंड पेाजल निगम

 

राज्य में एक भी को-ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित नहीं कर पाया। इस कारण यह पाया गया कि जिन घरों में सीवर कनेक्शन नहीं है, वहां से निकलने वाला सेप्टेन असुरक्षित तरीके से निपटाया जा रहा है, जिससे नदी प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है।

 

हरिद्वार और ऋषिकेश के STP पर क्षमता से ज्यादा दक्षायः कई STP अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक सीवेज प्राप्त कर रहे हैं। इसके कुछ उदाहरण यह हैं।

 

हरिद्वार का 68 MLD STP

 

63 MLD

 

-प्राप्त सीवेज 84 MLD तक

 

ऋषिकेश का चौरपानी STP

 

क्षमता 5 MLD

 

प्राप्त सीट 17 MLD

 

कुछ STP लगभग बेकार पड़े

 

कई जगह STP अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं। जिसे देवप्रयाग में क्षमता 1.40 MLD और केवल 70 घरों से सौर्वज प्राप्त जोशीमठ में 1.08 MLD STP और लाइन बंद हो जाने से STP लगभग खाली। इससे STP का उद्देश्य ही विफल हो गया।

 

गौचर में STP ही नहीं बनाया

 

गंगा किनारे बसे गौचर नगर में 3,930 घर हैं, लेकिन वह कोई STP नहीं बनाया गया। बाद में दिसंबर 2023 में स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत पीकल स्तज ट्रीटमेंट प्लांट का प्रस्ताव दिया गया।

 

12 STP से बिना उपचार के गंगा में गिर रहा सीवेज अऑडिट में पाया गया कि 12 STP से बिना उपचार के गंदा पानी गंगा में छोड़ा जा रहा

 

था। इनमें शामिल हैं ढालवाला STP (नि) कीर्तिनगर STP, प्रयाग के 4 STP

 

श्रीकोट STP, पोखरी बैंड STP (गोपेश्वर), कर्णप्रयाग के 4 STP

 

अऋषिकेश में ठेकेदार ने जानबूझकर गंगा में छोड़ा गंदा पानी

 

ऑडिट में खुलासा हुआ कि ऋषिकेश के साथ (3) MLD) और उपोयन (3.5 MLD) STP से संचालन ठेकेदार ने जानबूझकर बिना उपचार का सीवेज गंगा में छोड़ दिया यह जल अधिनियम 1974 का उल्लंघन है।

 

रुद्रप्रयाग में 6 STP बने लेकिन नाले ही नहीं जोड़े

 

सद्धास्थान में 2017 में 6 STP बनाए गए, लेकिन 5 नाते जो सीवेज और ठोस कबरा ला रहे थे। उन्हें योजना में शामिल ही नहीं किया गया। बार-

 

बार अनुरोध के बावजूद इन्हें जोड़ने की कार्रवाई नहीं हुई।

 

# STP बिना वैध अनुमति के चल रहे थे

 

44 STP में से 8 STP बार सात से बिना वैध अनुमति के चल रहे थे। इनके पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कंसॉलिडेटेड कंसेंट और ऑथराइजेशन नहीं थी। 18 STP

 

रखरखाव एजेंसी को सौंपे ही नहीं गए। वहीं, निर्माण एजेंसी उत्तराखंड जल निगम ने 18 STP कई साल बाद भी जल संस्थान को हस्तांतरित नहीं किए।

 

4.93 करोड़ का समज प्लांट बेकार ऋषिकेश में ₹4.93 करोड लागत का सहज मैनेजमेंट प्लांट बनाया गया, लेकिन स्लज की कैलोरीफिक वैल्यू कम थी

 

तकनीक व्यवहार्य नहीं थी। इसका पहले आकलन ही नहीं किया गया।

 

सुरक्षा ऑडिट न होने से हायसे

 

रिपोर्ट में सुरक्षा लापरवाही के कारण हुए गंभीर हादसे भी सामने आए। रुद्रप्रयाग में 75 KLD STP भूस्खलन में नह

 

और 0.88 करोड़ का नुकसान। चमोली में STP में बिजली उपकरणों की खराबी से 20 लोग करंट लगने से प्रभावित हुए, जिनमें 16 की मौत, 12 घायल हो गए थे।

 

बिना जरूरत बनाए गए श्मशान घाट

 

राज्य में 11 स्थानों पर शवदाह गृह बनाए गए, लेकिन

 

स्थानीय मांग का आकलन नहीं किया गया। सांस्कृतिक परंपराओं को नजरअंदाज किया गया, जिसका नतीजा

 

उनकर उपयोग नहीं हुआ। लोग नदी किनारे पारंपरिक चिता जलाते रहे।

 

885 करोड़ की योजना में सिर्फ 16% खार्च गंगा पुनर्जीवन के लिए वनरोपण योजना FIG (Forestry Interventions for

 

Ganga) के तहत कुल लक्ष्य 885.91 कलहरु तय किए गए थे। लक्ष्य क्षेत्र था 54,855 हेक्टेयर, लेकिन खर्च हुआ केवल 144.27 करोड़ रुपये (16%)।

 

प्रगति भी बेहद कमजोर रही

 

प्राकृतिक क्षेत्र 34%

 

कृषि क्षेत्र

 

बाहरी क्षेत्र: 6%

 

44 नगर निकायों ने कबरा प्रबंधन की अनुमति ही नहीं ली रिपोर्ट के अनुसार 44 नगर निकाय, जो रोज 5 टन से अधिक कचरा पैदा करते हैं,

 

उन्होंने 2016 से अब तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति नहीं ली। परिणाम स्वरूप शहरों में नदी किनारे कचरा जलाने और फेंकने की घटनाएं मिलीं। इन शहरों में शामिल रहे व्ॉशीमठ, गोपेश्वर कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, टिहरी, गौचर और उत्तरकाशी।

 

देवप्रयाग से हरिद्वार तक पानी की गुणवत्ता गिर गई 10 साल के डेटा के विश्लेषण में पाया गया कि देवप्रयाग तक गंगा का पानी A श्रेणी का है। लेकिन ऋषिकेश और हरिद्वार में श्रेणी का हो गया। देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच 93 किमी दूरी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 32 गुना बढ़ गया।

 

ज्यादातर STP मानकों पर खरे नहीं

 

2023 में निरीक्षण किए गए 44 STP में केवल 3-5 STP NGT मानकों पर खरे जरे। 6-12 STP MOEF मानकों पर खरे उतरे।

 

कई STP में प्रदूषण बेहद अधिक पाया गया

 

BOD: 1237 mg/l

 

TSS: 909 mg/

 

फीकल कोलीफॉर्म 24-10 MPN/100ml

 

प्रदूषण बोर्ड की जांच पर भी सवाल

 

हरिद्वार के 68 MLD जगजीतपुर ST के परीक्षण परिणामों में केंद्रीय प्रदूषण निर्धशत बोर्ड और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बीच बड़ा अंतर पाया गया। इससे राज्य बोर्ड की जांच प्रणाली पर सवाल उठे।

 

2.51 करोड़ रुपये नियमों के विरुद्ध रोके गए क्रियान्वयन एजेंसियों ने 1.92 करोड़ रुपये अध्यदित धन

 

और ब्याज के 0.59 कनौड़ रुपये GFR 2017 के नियमों के खिलाफ अपने पास रोके रखें । दूसरी तरफ जगजीतपुर और सराय के STP को टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट के रूप में

 

स्वीकृति मिली थी। लेकिन, IIT रुड़की ने सून्य MPN/100ml फीकल कोलीफॉर्म मानक तय किया था टैार प्रक्रिया में इसे 100 MPN/100ml कर दिया गया, फिर भी पहांट उस डीले मानक को भी पूरा नहीं कर पाए।

 

CAG ने सरकार को दिए 11 सुझाव सभी STP का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जाए सभी वरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ा जाए

 

सेप्टेज के सुरक्षित निपटान के लिए को ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएं STP की क्षमता तय करते समय वास्तविक डेटा लिया जाए स्लज प्रबंधन तकनीक लागू करने से पहले परीक्षण हो

 

स्मशान घाटों के उपयोग के लिए जागरूकता अभियान चलें सभी नगर निकायों को ठोस कचरा प्रबंधन की अनुमति लेनी होगी प्रदूषण बोर्ड की प्रयोगशालाओं को NABL मान्यता मिले गंगा अंग पोर्टल की खामियां दूर की जाए

 

STP के खराब प्रदर्शन पर एजेंसियों की जवाबदेही तय हो

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