उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद की उत्तुंग पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य प्रतिष्ठित सिद्धपीठ सुरकंडा देवी इन दिनों अपनी अगाध महिमा के कारण राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। समुद्र तल से लगभग नौ हजार फीट की ऊँचाई पर अवस्थित यह महाशक्तिपीठ सदियों से आत्म-साधना का पावन केंद्र रहा है। जून की शुरुआत में यह आदि-धाम देश की सुर्खियों में आ गया, जब अपनी सिंह-गर्जना जैसी वाक्शैली और प्रखर राजनीतिक पहचान रखने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने यहाँ लगातार चार दिवसों तक मौन साधना की और भगवती के चरणों में अंतर्यात्रा में लीन रहे। यह प्रवास किसी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की बिसात या प्रचार-यात्रा का हिस्सा नहीं था। यह अंतरात्मा की पुकार पर उमड़ी एक ऐसी महायात्रा थी, जहाँ आस्था का असीम समंदर, एकांत का सन्नाटा और हिमालय की दिव्य आध्यात्मिक रश्मियाँ एक-दूसरे में एकाकार हो गईं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, सिद्धू का आचरण इस पूरी अवधि में किसी विरक्त योगी की भाँति नितांत सरल और आडंबरहीन रहा, जिसने सुरकंडा देवी की आध्यात्मिक महत्ता को पुनः राष्ट्रीय पटल पर रेखांकित कर दिया।
पैदल चढ़ाई से शुरू हुई अंतर्यात्रा
मंदिर समिति के प्रमुख सदस्य जड़धार गांव के आशीष जड़धारी बताते हैं कि नवजोत सिंह सिद्धू 31 मई को सुरकंडा देवी की चौखट पर आ पहुंचे थे। उस दिन पहाड़ों पर काले-घने बादलों का डेरा था और प्रचंड बयार के कारण रोपवे सेवा भी सुचारू रूप से संचालित नहीं हो पा रही थी। ऐसे प्रतिकूल वातावरण में अमूमन लोग यात्रा स्थगित कर देते हैं, पर सिद्धू के भीतर श्रद्धा की ‘अखंड लौ’ जल रही थी। उन्होंने कद्दूखाल की तलहटी से मंदिर के शिखर तक की लगभग दो किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई को पैदल ही नापना शुरू किया। खड़ी ढलान और विरल होती ऑक्सीजन के बावजूद, सिद्धू ने बिना किसी वीआईपी तामझाम के यह चढ़ाई फतह की और सीधे गर्भगृह में पहुंचकर आदिशक्ति के चरणों में साष्टांग दंडवत हो गए। दर्शनोपरांत, उन्होंने मंदिर समिति से एकांत में आत्म-साधना करने का विनम्र आग्रह किया और संसार के सारे कोलाहल से परे, लगभग दो से ढाई घंटे तक महामाया के सम्मुख ध्यानमग्न बैठे रहे।
चार दिनों तक चला मौन-साधना का अखंड अनुष्ठान
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, यह कोई क्षणिक वैराग्य नहीं था। सिद्धू अगले तीन दिनों तक—1 जून, 2 जून और 3 जून को भी—लगातार सुरकंडा देवी के दरबार में हाजिरी लगाते रहे। ग्रीष्मावकाश के कारण समूचे देश से लाखों श्रद्धालुओं का रेला यहाँ उमड़ रहा था। दिन के समय जब मंदिर प्रांगण में भारी भीड़ होती, तो सिद्धू लोक-चक्षुओं से दूर रहने का प्रयास करते। वे प्रायः संध्याकाल के धुंधलके में मंदिर पहुंचते, जब ढलते सूरज की किरणें बर्फानी चोटियों को विदाई दे रही होती थीं, और एक शांत कोने में बैठकर ध्यान की गहराइयों में उतर जाते। आशीष जड़धारी के अनुसार, साधना के उन पावन क्षणों में उन्हें संसार की दखलंदाजी रत्ती भर भी स्वीकार नहीं थी। वे पूरी एकाग्रता के साथ शून्य में विलीन रहते थे। आश्चर्य तो यह है कि मंदिर से लौटकर अपने होटल पर भी वे मौन और आत्मचिंतन के इसी क्रम को अनवरत बनाए हुए थे।
सुरकंडा में इन दिनों उमड़ रहे 12000 यात्री: यह वैभव किसी चारधाम से कम नहीं
सुरकंडा देवी की लोकप्रियता अब एक नए स्वर्ण काल में प्रवेश कर चुकी है। इन दिनों ग्रीष्मकालीन छुट्टियों और सप्ताहांत के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं का ऐसा अभूतपूर्व सैलाब उमड़ रहा है कि प्रतिदिन आने वाले यात्रियों का आंकड़ा 12,000 की रिकॉर्ड सीमा को छू रहा है। कद्दूखाल से लेकर मंदिर परिसर तक आस्था का जो महाकुंभ नजर आता है, उसकी भव्यता देखकर हर कोई दंग है। स्थानीय निवासियों और विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि सुरकंडा धाम का यह बढ़ता प्रताप अब उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध ‘चारधाम यात्रा’ के समानांतर खड़ा हो गया है। जिस प्रकार केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में भक्तों की अटूट कतारें लगती हैं, ठीक वैसा ही अलौकिक नजारा और श्रद्धा का ज्वार आज सुरकंडा की पहाड़ियों में देखने को मिल रहा है। बुनियादी सुविधाओं के विकास और सुगम रास्तों ने इस सिद्धपीठ को देश के सबसे बड़े धार्मिक आस्था केंद्रों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है।
जब ध्यान की एकाग्रता के आगे ठहर गई ‘धोनी’ की मौजूदगी
सिद्धू की इस साधना की गहराई और सुरकंडा के प्रति उनकी अटूट एकाग्रता का एक बेहद दिलचस्प और अनूठा किस्सा भी चर्चा में है। बताया जाता है कि ठीक इन्हीं दिनों भारतीय क्रिकेट के नायक महेंद्र सिंह धोनी भी अपने बच्चों के स्कूल एडमिशन के सिलसिले में मसूरी आये थे। मसूरी-धनोल्टी से आगे सुरकंडा के ही पास एक होटल में ठहरे हुए थे। संयोग ऐसा था कि जिस होटल में सिद्धू रुके थे, धोनी भी उसके ठीक बगल वाले होटल में ही विश्राम कर रहे थे। क्रिकेट जगत के दो दिग्गज एक ही जगह, इतने पास मौजूद हों, तो स्वाभाविक रूप से प्रशंसकों के लिए यह एक ऐतिहासिक मिलन का क्षण हो सकता था। लेकिन सिद्धू उस समय लोक-संसार से पूरी तरह विमुख होकर आदिशक्ति के ध्यान में इस कदर लीन थे कि उन्हें बाहरी दुनिया की किसी हलचल का भान ही नहीं था। वे अपनी साधना के प्रति इतने एकाग्र थे कि पड़ोस में रहने के बावजूद इन दोनों महान क्रिकेटरों की कोई मुलाकात या बातचीत तक नहीं हुई। सिद्धू ने अपनी अंतर्यात्रा की मर्यादा को सर्वोपरि रखा और संसार के सबसे बड़े सेलिब्रिटी की निकटता भी उनके ध्यान को डिगा नहीं सकी।
टीवी की चकाचौंध से परे एक निश्छल, सरल साधक
संपूर्ण राष्ट्र नवजोत सिंह सिद्धू को उनकी प्रखर शेरो-शायरी, अटूट हास्यबोध और मंचीय ऊर्जा के लिए जानता है। क्रिकेट की पिच हो, राजनीति का अखाड़ा हो या मनोरंजन का पर्दा—उन्होंने हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी है। परंतु, सुरकंडा की इस पावन छांव में लोगों ने उस ‘अट्टहास’ के पीछे छिपे एक भावुक और प्रार्थना करते हुए अत्यंत विनीत साधक को देखा। प्रथम दिन मंदिर समिति ने परंपरा के अनुसार पुष्पमाला पहनाकर उनका आदर-सत्कार किया, परंतु इसके बाद सिद्धू ने किसी भी प्रकार की औपचारिकता को स्वीकार करने से मना कर दिया। यद्यपि वे अपनी इस यात्रा को गुप्त रखना चाहते थे, पर उनका जगप्रसिद्ध चेहरा भला कैसे छिपता! श्रद्धालुओं ने उन्हें पल भर में पहचान लिया। लोगों ने तस्वीरें खिंचवाईं, ऑटोग्राफ मांगे, किंतु सिद्धू ने बिना किसी को आहत किए, बड़े ही सौम्य तरीके से अपनी आध्यात्मिक यात्रा की मर्यादा को अक्षुण्ण रखा।
साधना का मनोविज्ञान और विदाई की भावुक बेला
भारतीय सनातन वांग्मय में साधना को ‘स्व’ से ‘सर्व’ की ओर बढ़ने वाली एक आंतरिक यात्रा माना गया है। मनोवैज्ञानिकों और योग-मनीषियों का मत है कि ऐसा नियमित ध्यान व्यक्ति के भीतर भावनात्मक संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता को एक नई धार देता है। जो लोग दशकों तक सार्वजनिक जीवन की आपाधापी और राजनीति के अंतहीन संघर्षों में तपते हैं, उनके लिए यह ‘मानसिक रिबूट’ और भी अपरिहार्य हो जाता है। यही कारण है कि सदियों से शीर्ष पुरुष अपने मुकुट और सिंहासन छोड़कर अंततः हिमालय के आध्यात्मिक चुंबकीय केंद्र की ओर खिंचे चले आते हैं। जड़धारी ने बताया कि साधना के अंतिम दिन (3 जून) की विदाई बेला में सिद्धू का वह वज्र जैसा दिखने वाला व्यक्तित्व अत्यंत कोमल हो उठा। जब वे मां के दरबार से अंतिम प्रणाम करके मुड़े, तो उनकी आंखें डबडबाई हुई थीं।
उन्होंने भर्राए गले से कहा: “माँ ने इस बार मुझे अकेले बुलाया था ताकि मैं खुद को जान सकूँ। पर अगली बार जब आऊँगा, तो अपनी अर्धांगिनी (पत्नी) को भी इस महातीर्थ के दर्शनों के लिए साथ लाऊँगा।”
सिद्धू के इन संवेदनशील शब्दों को सुनकर वहां उपस्थित ग्रामीणों और पुजारियों का हृदय भी भर आया। समिति के सदस्यों ने उन्हें सजल नेत्रों से पुनः आगमन का भावभीना निमंत्रण दिया।
सुगम मार्ग और चारधाम के समानांतर उभरती महिमा
सुरकंडा देवी अब केवल एक पारंपरिक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि यह उत्तराखंड के सबसे तीव्र गति से उभरते हुए धार्मिक-पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। पहले जहां कद्दूखाल से मंदिर तक की दुर्गम चढ़ाई केवल पैदल तय होती थी, वहीं अब अत्याधुनिक रोपवे की सुविधा ने इसे सुगम बना दिया है। हालांकि, पहाड़ों की विषम भौगोलिक स्थिति के कारण जब कभी मौसम करवट लेता है, तो प्रशासन सुरक्षा कारणों से रोपवे को तुरंत रोक देता है और श्रद्धालु पैदल मार्ग का सहारा लेते हैं। देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार से लेकर मसूरी, टिहरी और उत्तरकाशी तक के सुदूर अंचलों से रोज़ाना हज़ारों गाड़ियां इस ओर रुख कर रही हैं, जो देवभूमि के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक नई इबारत लिख रहा है।
इतिहास, लोकविश्वास और चौखंबा-बंदरपूंछ का दिव्य दर्शन
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सुरकंडा देवी 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक हैं, जहाँ माता सती का ‘शिर’ (सिर) पतित हुआ था। गढ़वाल की समृद्ध लोक-परंपरा में जड़धार गांव को माता का ‘मायका’ (पीहर) और गुजराड़ा क्षेत्र को उनका ‘ससुराल’ स्वीकार किया गया है। गंगा दशहरा और नवरात्रों के पावन पर्व पर यहाँ लगने वाले महामेलों में उत्तराखंड के पारंपरिक ढोल-दमाऊं की थाप और स्थानीय लोकगीत पूरे माहौल को अलौकिक बना देते हैं। सुरकंडा देवी की सबसे अनुपम विशेषता इसका विराट प्राकृतिक ऐश्वर्य भी है। जब साधक मंदिर के प्रांगण में खड़ा होकर उत्तर दिशा की ओर देखता है, तो सामने साक्षात देवत्व मुस्कुराता नजर आता है। चौखंबा,बंदरपूँछ,स्वर्गारोहिणी, काला नाग (ब्लैक पीक), गंगोत्री समूह, शिवलिंग ,मेरु, केदारनाथ–बदरीनाथ क्षेत्र, केदारनाथ शिखर, केदार डोम, सतोपंथ , कामेत
हाथी पर्वत की धवल-श्वेत चोटियाँ इतनी स्पष्ट और भव्य दिखाई देती हैं, मानो हाथ बढ़ाकर आसमान को छू रही हों। स्थानीय गढ़वाली बोली में इस सौंदर्य की अनुभूति कुछ ऐसी है:
“अरे भाई! अड़ोसी-पड़ोसी त सब दूर राई जाँदन, पर सुरकंडा माई की या ऊँची डाँडी (चोटी) पर खड़ो ह्वैक जब कोई मान्छ देख्द, त यनु लग्द जनूं चौखंबा अर बंदरपूंछ की य चमचमाती बर्फीली चोटियों जमा (बिलकुल) बुरुंई कनी सामणी खड़ी ह्वैक बात करणी हों! हवा का या ठंडा झोंका अर देवदार का झाड़ौं (जंगलों) की खुश्बू देखिक मन जमा (बिलकुल) बाग-बाग ह्वै जाँद!”
ठंडी-बर्फानी हवा के थपेड़े, बादलों का मखमली आना-जाना और बांझ-देवदार के घने जंगलों की हरीतिमा मिलकर एक ऐसा सम्मोहन रचते हैं जो अंतरात्मा को झंकृत कर देता है।
नवजोत सिंह सिद्धू की यह चार दिवसीय सुरकंडा-यात्रा चाहे उनकी नितांत निजी आध्यात्मिक व्याकुलता का शमन रही हो, परंतु इसने इस सिद्धपीठ को राष्ट्रीय फलक पर एक नई दीप्ति प्रदान की है। जो देश सिद्धू को केवल उनकी कड़कड़ाती आवाज़ और टेलीविजन के ठहाकों से मापता था, उस देश ने इस बार हिमालय के सन्नाटे में आंसू बहाते और ध्यान लगाते एक अनूठे साधक को देखा।
यह यात्रा आधुनिक युग के मानव को एक बहुत बड़ा संदेश दे जाती है कि संसार की तमाम भौतिक चकाचौंध के बीच भी मनुष्य का मन अंततः उस परम शांति और दैवीय ऊर्जा के लिए ही तरसता है। और जब यह शाश्वत खोज उसे सुरकंडा जैसी पावन सिद्धपीठ तक ले आती है, तो वह यात्रा आस्था, संस्कृति और आत्म-अन्वेषण की एक साझा व शानदार महागाथा बन जाती है।

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